श्रद्धेय अटलजी जन्मशताब्दी पर विशेष
Lokmata Ahilyabai

भारत रत्न श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी स्वतंत्र भारत के सबसे प्रभावी और समावेशी नेताओं में से एक थे। ओजस्वी, वाग्मिता व दूरदर्शिता से विभूषित वे उन नेताओं में अग्रणी बने जो एक सशक्त राजनीतिक संगठन का निर्माण करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। उनका जीवन त्याग, साहस, नैतिकता और सिद्धांतों के प्रति निष्ठा का प्रतीक रहा। उनके राजनीतिक जीवन में संगठन निर्माण की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही। वे संगठन को केवल सत्ता प्राप्ति का माध्यम नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण का सशक्त साधन मानते थे। वे मानते थे कि एक सशक्त और संगठित राजनीतिक दल ही देश को स्थिरता और विकास की दिशा में आगे बढ़ा सकता है।

त विनिर्माण प्रणालियों को बनाय रखने को बढ़ावा देते हैं।

अटलजी ने भारतीय राजनीति के उस संक्रमण काल में नेतृत्व किया, जब देश सामाजिक और आर्थिक चुनौतियों से जूझ रहा था। 21वीं सदी के भारत को नए आयाम देने में उनकी निर्णायक भूमिका रही।

बीज का वटवृक्ष बना

अटल जी को राजनीति उनके घर से संस्कार स्वरूप मिली। उनके पिता कृष्ण बिहारी वाजपेयी एक शिक्षक और कवि थे। अटलजी बचपन से ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े और उन्होंने ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ में भी सक्रिय भूमिका निभाई। संघ के संस्कारों ने उनके व्यक्तित्व को आकार दिया। वे जनसंघ के संस्थापक सदस्यों में रहे और बाद में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को राष्ट्रव्यापी संगठन बनाने में अग्रणी भूमिका निभाई।

1951 में डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी द्वारा स्थापित भारतीय जनसंघ में अटल जी ने सक्रिय भूमिका निभाई। उन्होंने जनसंघ को वैचारिक मजबूती दी और उसे जनाधार प्रदान किया। उनके नेतृत्व में संगठन ने अनेक उतार-चढ़ाव देखे, परंतु सिद्धांतों से समझौता नहीं किया।

अटलजी की वाग्मिता और संवाद शैली ने उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर लोकप्रिय बनाया। वे विपक्ष में रहते हुए भी सत्ता पक्ष का सम्मान करते थे और लोकतांत्रिक मर्यादाओं का पालन करते थे। 1975-77 के आपातकाल के दौरान उन्होंने लोकतंत्र की रक्षा के लिए संघर्ष किया और जेल भी गए। यह काल भारतीय राजनीति में एक निर्णायक मोड़ था।

आपातकाल के बाद जनता पार्टी का गठन हुआ और अटलजी ने इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। बाद में भारतीय जनता पार्टी का गठन हुआ, जिसमें वे संस्थापक नेताओं में से एक थे। 1984 में भाजपा को केवल 2 सीटें मिलीं, लेकिन अटलजी के नेतृत्व और संगठन क्षमता के कारण पार्टी ने धीरे-धीरे विस्तार किया

अटलजी का व्यक्तित्व केवल राजनीतिक सीमाओं तक सीमित नहीं था। वे एक संवेदनशील कवि, लेखक और विचारक भी थे। उनके भाषणों में राष्ट्रवाद, लोकतंत्र और विकास का समन्वय दिखाई देता था। वे गठबंधन राजनीति के कुशल शिल्पी थे और विभिन्न दलों को साथ लेकर चलने की अद्भुत क्षमता रखते थे।

उनके नेतृत्व में राष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) की सरकार बनी। 1996 में पहली बार प्रधानमंत्री बने, यद्यपि सरकार अल्पमत में थी। 1998 और 1999 में उन्होंने पुनः सरकार बनाई और देश को स्थिर नेतृत्व दिया।

अटलजी ने प्रधानमंत्री के रूप में अनेक ऐतिहासिक निर्णय लिए। पोखरण परमाणु परीक्षण, लाहौर बस यात्रा, और कारगिल युद्ध के दौरान उनका नेतृत्व दृढ़ और संतुलित रहा। उन्होंने राष्ट्रीय राजमार्ग विकास परियोजना और प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना जैसी योजनाओं की शुरुआत की।

उनकी राजनीति समावेशी और संवाद आधारित थी। वे ‘गठबंधन धर्म’ का पालन करने वाले नेता थे। उनके कार्यकाल में भारत ने आर्थिक, सामरिक और कूटनीतिक क्षेत्रों में उल्लेखनीय प्रगति की।

अटलजी का जीवन हम सबके लिए प्रेरणा है। वे संगठन के सच्चे शिल्पी थे, जिन्होंने विचार और सिद्धांतों के आधार पर एक मजबूत राजनीतिक दल का निर्माण किया। उनका योगदान भारतीय राजनीति में सदैव स्मरणीय रहेगा।

1975-77 के आपातकाल का दौर वाजपेयी और जनसंघ दोनों के लिए एक निर्णायक समय था। उन्होंने निरंकुशता का विरोध करने और लोकतांत्रिक मानदंडों की बहाली की वकालत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। चुनौतियों के बावजूद उनके नेतृत्व ने सुनिश्चित किया कि पार्टी अपने सिद्धांतों के प्रति अडिग रहे। आपातकाल के बाद बना जनता पार्टी का संक्षिप्त प्रयोग अंततः असफल साबित हुआ, जिससे गठबंधन के भीतर जनसंघ असहज हो गया।

असामयिक निधन के बाद अटल बिहारी वाजपेयी ने जनसंघ का नेतृत्व संभाला। पार्टी के मूल सिद्धांतों को बनाए रखते हुए और व्यापक राजनीतिक गठबंधनों की आवश्यकता को संतुलित करते हुए उन्होंने एक सम्मानित राष्ट्रीय नेता के रूप में अपनी पहचान बनाई। 1971 के युद्ध के दौरान वाजपेयी जी ने दलगत राजनीति से ऊपर उठकर सरकार को अपना पूर्ण समर्थन देकर अपनी परिपक्वता और राष्ट्रीय दृष्टिकोण का परिचय दिया। 1974 में उन्होंने श्री जयप्रकाश नारायण द्वारा शुरू किए गए आंदोलन में जनसंघ की सक्रिय भागीदारी का नेतृत्व किया, जिससे लोकतंत्र और न्याय के लिए लड़ाई को मजबूती मिली।

भाजपा — भारत के राष्ट्रवाद का समवेत स्वर

1980 में जनता पार्टी गठबंधन के विघटन के बाद अटल जी ने भारतीय जनसंघ को पुनर्गठित कर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के रूप में स्थापित करने में अहम भूमिका निभाई। भाजपा के पहले अध्यक्ष के रूप में वाजपेयी जी ने पार्टी की वैचारिक नींव रखी, जिसमें राष्ट्रवादी जड़ों को व्यापक राष्ट्रीय हितों के साथ जोड़ने का प्रयास किया गया। उनके नेतृत्व में भाजपा ने समाजवाद और भारतीय राष्ट्रवाद को अपने मार्गदर्शक सिद्धांतों के रूप में अपनाया, जिससे पार्टी को एक मध्यममार्गी दृष्टिकोण मिला। वाजपेयी जी की उदार छवि और समावेशिता पर जोर ने व्यापक जनसमर्थन आधार जुटाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनके नेतृत्व ने भाजपा के शुरुआती संघर्षों के दौरान पार्टी को जीवित रखा और धीरे-धीरे मुख्यधारा की राजनीतिक पार्टी के रूप में स्वीकार्यता दिलाई। पार्टी का मत प्रतिशत 1984 के 7.74% से बढ़कर 1991 में 20.1% हो गया और यह अटल जी के नेतृत्व की देन थी।

वाजपेयी जी की सबसे बड़ी उपलब्धि यह थी कि उन्होंने राष्ट्रवाद को इस तरह प्रस्तुत किया जो भारतीय मतदाताओं के साथ समवेत स्वर हुआ। कठोर रुख अपनाने वाले नेताओं से अलग वाजपेयी जी का दृष्टिकोण उदारता और व्यावहारिकता से प्रेरित था, इसका लाभ विशेष रूप से कठिन समय में परिलक्षित हुआ। 1992 के बाद वाजपेयी जी के नेतृत्व ने भाजपा को उस राजनीतिक अलगाव से उबरने में मदद की और इसके बाद पार्टी ने क्षेत्रीय दलों के साथ रणनीतिक गठबंधन बनाने में सफलता प्राप्त की।

गठबंधन धर्म के वास्तविक नेता

2009 तक अपने 65 वर्षों के सक्रिय सार्वजनिक जीवन में अटल जी ने लगभग 56 वर्ष विपक्ष में और केवल नौ वर्ष सत्ता में बिताए। अनेक राजनीतिक जीवन की यह यात्रा भविष्य में शुचिता और सिद्धांतों की राजनीति की मार्गदर्शिका सिद्ध होगी। 1990 के दशक में वाजपेयी का नेतृत्व भारतीय जनता पार्टी के लिए एक...

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गठबंधन राजनीति की जटिलताओं को सुलझाने की उनकी क्षमता उस समय स्पष्ट हुई जब वह 1996 में भारत के प्रधानमंत्री बने, हालांकि यह कार्यकाल केवल 13 दिनों का था। परन्तु अटल जी के संसद में दिए भाषण ने सम्पूर्ण भारत के विपुल जनसमुदाय को अपने भावनाओं में बांध लिया। अटल जी के साथ हुए राजनीतिक छल का उत्तर जनता 1998 में अपने वोटों से दिया और फिर से अटल जी ने सत्ता में वापसी की।

1998 से 2004 तक अपने कार्यकाल के दौरान वाजपेयी जी ने 20 से अधिक पार्टियों के गठबंधन को एकजुट रखने में अद्वितीय राजनीतिक क्षमता का प्रदर्शन किया। यह भारतीय संविधान में लोकतंत्र की भावना और उसकी अखंडता को स्वीकार कर सबको साथ चलने का एक अनोखा उदाहरण था। उनकी सरकार की स्थिरता ने इस विचार को खारिज कर दिया कि गठबंधन सरकारें स्वाभाविक रूप से कमजोर होती हैं। उनके नेतृत्व में भाजपा का सीट शेयर 1998 के आम चुनावों में महत्वपूर्ण रूप से बढ़कर 182 तक पहुंच गया, जो उनकी व्यापक लोकप्रियता और रणनीतिक दूरदृष्टि का प्रमाण था।

उत्कृष्ट संगठन शिल्पी

अटल जी का नेतृत्व भाजपा में एकता को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण था, वे अक्सर पार्टी के विभिन्न दृष्टिकोणों के बीच मध्यस्थता करते थे। उनके मध्यम दृष्टिकोण ने भाजपा को एक राष्ट्रवादी पार्टी के रूप में कांग्रेस से अलग देश के लिए एक बेहतर और विश्वसनीय विकल्प के रूप में विकसित किया।

वाजपेयी जी की सबसे बड़ी उपलब्धि यह थी कि उन्होंने राष्ट्रवाद को इस तरह प्रस्तुत किया जो भारतीय मतदाताओं के साथ समवेत स्वर हुआ। कठोर रुख अपनाने वाले नेताओं से अलग वाजपेयी जी का दृष्टिकोण उदारता और व्यावहारिकता से प्रेरित था, इसका लाभ विशेष रूप से कठिन समय में परिलक्षित हुआ। 1992 के बाद वाजपेयी जी के नेतृत्व ने भाजपा को उस राजनीतिक अलगाव से उबरने में मदद की और इसके बाद पार्टी ने क्षेत्रीय दलों के साथ रणनीतिक गठबंधन बनाने में सफलता प्राप्त की।

वाजपेयी जी के प्रधानमंत्री बनने के दौरान ऐतिहासिक आर्थिक सुधारों की शुरुआत हुई। भ्रष्टाचार विहीन, शुचिता-पारदर्शिता पूर्ण शासन ने भाजपा की पहचान एक साफ-सुथरी पार्टी के रूप में पहचान दिया। गोल्डन क्वाड्रिलेटरल हाईवे परियोजना और प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना ने भारत की आधारभूत संरचना में क्रांति ला दिया। तमाम परियोजनाएं जो कनेक्टिविटी बढ़ाने और आर्थिक विकास को बढ़ावा देने के उद्देश्य से बनाई गई थीं, इसने भाजपा की छवि को एक विकासात्मक पार्टी के रूप में मजबूत किया।

वाजपेयी जी की विदेश नीति के सार्थक कदमों, जिसमें लाहौर बस सेवा और पाकिस्तान के साथ आगरा शिखर सम्मेलन शामिल, अमेरिका-इजराइल के साथ संबंधों में गहराई ने उनके शांति, विकास और संवाद के प्रति समर्पण को उजागर किया। कारगिल युद्ध जैसे चुनौतियों के बावजूद अटल जी के राजनीतिक कौशल ने भारत की वैश्विक स्थिति को बेहतर किया। 1998 में परमाणु परीक्षणों का निर्णय भारत की रणनीतिक स्वतंत्रता को प्रदर्शित करता है, जिसने उन्हें एक निर्णायक नेता के रूप में स्थापित किया।

अपने ओजस्वी भाषणों के लिए प्रसिद्ध वाजपेयी जी के भाषण अक्सर जनमानस में गहरी छाप छोड़ते थे। जटिल मुद्दों को सरलता से समझाने और काव्यात्मक शैली में प्रस्तुत करने की उनकी क्षमता ने उन्हें अपने समय के सबसे लोकप्रिय नेताओं में से एक बना दिया। उनका यह आकर्षण भाजपा के लिए विभिन्न वर्गों से समर्थन जुटाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता था।

विरासत और दूरगामी प्रभाव

अटल बिहारी वाजपेयी जी के योगदान भाजपा के लिए मौलिक और क्रांतिकारी थे। उनके कार्यकाल ने भाजपा को एक सीमांत राजनीतिक दल से एक प्रबल शक्ति में बदल दिया, जो भारत की राजनीतिक धारा को आकार देने में सक्षम बनी। उनके नेतृत्व में भाजपा ने न केवल राजनीतिक वैधता हासिल की, बल्कि नरेन्द्र मोदी जी जैसे वैश्विक नेताओं के नेतृत्व के लिए आधारशिला का निर्माण किया।

वाजपेयी जी का यह दृष्टिकोण कि वैचारिक प्रतिबद्धता को व्यावहारिक शासन के साथ जोड़ना चाहिए, भाजपा के लिए एक नीति निर्देशक तत्व बनकर रणनीति और दृष्टिकोण को प्रेरित करता है। अटल बिहारी वाजपेयी जी का भाजपा के निर्माण में योगदान अतुलनीय है। भारतीय जनसंघ को एक आधुनिक राजनीतिक दल में बदलने से लेकर भारत को परिवर्तनकारी वर्षों से गुजरते हुए नेतृत्व देने तक, उनकी दृष्टि और नेतृत्व आज भी प्रेरणा का स्रोत बने हुए हैं। उनकी विरासत केवल उस नेता की नहीं है जिसने अपनी पार्टी को सत्ता के शीर्ष तक पहुंचाया, बल्कि एक ऐसे राजनेता की भी है जिसने एक प्रगतिशील, समावेशी और वैश्विक रूप से सम्मानित भारत की कल्पना की। भाजपा की शासन पद्धति और विचारधारा में अटल जी का प्रतिबिम्ब मौजूद है, जिससे वह भारतीय लोकतंत्र और राजनीतिक कुशलता के एक स्थायी प्रतीक बने हुए हैं।

(लेखक भाजपा के राष्ट्रीय महामंत्री एवं राज्यसभा सांसद हैं)

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